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Wednesday, June 30, 2021

समकालीन हिंदी साहित्य में चुनौतियाँ – लेखक : रिज़वान ऐजाज़ी

मुंशी प्रेमचंद की एक सूक्ति है - जिस साहित्य से हमारी सुरुचि न जागे ,आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति न मिले,हम में गति और शक्ति न पैदा हो, हमारा सौंदर्य प्रेम न जागृत हो जो हममें संकल्प और कठिनाइयों पर विजय पाने की सच्ची दृढ़ता न  उत्पन्न करे ,वह हमारे लिए बेकार है ।

वह साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं है।
यहाँ वाल्टेयर की सूक्ति भी अति महत्वपूर्ण है - असभ्य राष्ट्रों को छोड़ कर शेष सम्पूर्ण विश्व पर पुस्तकों का शासन है ।
निश्चित रूप से प्राचीन भारत की सांस्कृतिक ,नैतिक शिक्षा का अनुसरण संसार ने किया है परन्तु भारत और अन्य देशों में बहुत अंतर भी रहा है ।
विश्व के अधिकाँश देशों में संस्कृति ,धर्म और दर्शन जीवन के हिस्से रहे हैं परन्तु भारत में ऐसा नहीं है।यहां के नागरिकों का जीवन धर्म पर ही आधारित रहा है ।
संस्कृति ,दर्शन, साहित्य और जनजीवन धर्म पर ही आधारित रहे हैं ।
धार्मिक पुस्तकों से ही नैतिकता ,सत्यता और जीवन जीने की कला एवं शिक्षा विद्यार्थी प्राप्त करता आ रहा है ।
भारत विभिन्न भाषाओं का देश है । हर भाषा ने महान साहित्यकारों को जन्म दिया है ।
जहाँ रविन्द्र नाथ टैगोर बंगाली थे ,महात्मा गांधी गुजराती थे व बाल गंगाधर तिलक दक्षिण भारतीय परन्तु इनकी पहुंच,इनकी आवाज़ देश के कोने कोने में पहुँचती थी ।
Hindi Sahitya, Rizwan Aijazi, Hilview Samachar
 साहित्य क्या है ?
अपनी रचनाओँ के माध्यम से एक नागरिक को दूसरे नागरिक के निकट लाने का सुदृढ़ माध्यम ।
निश्चित रूप से साहित्य की निकटता से मनुष्य में बुद्धि ,विवेक,संवेदनशीलता ,सौन्दर्य बोध विकसित होता है । उसे दूसरे व्यक्ति के दुःख दर्द ,भावनाएँ ,कठिनाइयाँ समझने का अहसास होता है ।
विभिन्न जातियों ,धर्मों ,संस्कृतियों ,विचारों के ज्ञान का सशक्त माध्यम साहित्य ही रह है जो व्यक्ति को सहज ,सरल ,निष्कपट ,निस्वार्थ बनाने का प्रयास करता है ।
समाज में फैली कुरुतियों, अंधविश्वासों को दूर करने के लिये  देश के महापुरुषों ने साहित्यकारों को आगे किया है ,उनका सम्मान किया है ।
महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों ने स्वयं पुस्तकें लिख कर ,समाचार पत्रों के प्रकाशन व उसमें अपनी भावनाएँ लिख कर देश के कोने कोने में पहुँचाई हैं ।
स्वयं गुजराती में लिखने के बावजूद गांधी जी ने हिंदी भाषा को सम्पूर्ण भारत की भाषा बनाने के लिये  एक तरह से आंदोलन छेड़ दिया था ।
महात्मा गांधी ,जवाहरलाल नेहरू ,बाल गंगाधर तिलक , डॉ राजेन्द्र प्रसाद ,सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी आत्मकथाओं ,पुस्तको के माध्यम से अपने संघर्ष ,जीवन ,नैतिकता ,सत्य और अहिंसा का सन्देश जन जन तक पहुंचाया है । 
निश्चित रूप से साहित्य जगत में भारत का नाम आदर से लिया जाता रहा है ,बहुत से रचनाकारों ,कवियों ने अपनी सशक्त रचनाओं से देश के नागरिकों को अंधविश्वास ,भेदभाव ,छुआछूत ,कुरूतियों से छुटकारा दिलवाया था ।
देश के स्वतंत्रता आंदोलन  में भी साहित्यकारों का सराहनीय योगदान रहा है ।
परन्तु समय के परिवर्तन के साथ ही बहुत कुछ परिवर्तित होता जाता है एवं जिसने परिवर्तन के नियम को नहीं समझा वह जनमानस के मनमस्तिष्क से ओझल हो जाता है ।
यहाँ हिंगेल जो कि सुप्रसिद्ध दार्शनिक ,विचारक और कई वर्षों तक बर्लिन विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे हैं ,उन्होंने आज से लगभग सन 1800  में जो कहा था वह आज सत्य साबित होता दिखाई दे रहा है ।
हिंगेल का  कथन था कि - 
साहित्य एक युग की देन है परन्तु
साहित्य एक युग में समाप्त भी हो जायेगा ।
हिगेल के कथन की सार्थकता वर्तमान में दिखाई दे रही है ।
विश्व के अधिकांश देशों में आधुनिकता की होड़ के उपरांत भारत ने अपनी संस्कृति, साहित्य ,अस्मिता को सुरक्षित रखने में सफल रहा परन्तु बाजार के उदारीकरण के फलस्वरूप विज्ञान ,प्राद्योगिकी सूचना,संचार ,अभियांत्रिकी, रेडियो ,टीवी ,कम्प्यूटर ,मोबाइल ,इंटरनेट की पहुँच देश के हर नागरिक के बेडरूम तक में पहुँच चुकी है ।
आज हर व्यक्ति के हाथ में मोबाइल है।पलक झपकते ही एक अँगुली के  इशारे पर गूगल संसार की हर जानकारी उसके समक्ष हाज़िर कर देता है ।
परन्तु उस ज्ञान की सत्यता क्या है ?
वह ज्ञान कहाँ से, किस रूप में ,किस ने वहाँ पहुँचाया  है ?
उसको प्रमाणिक कौन करेगा ?
इसका उत्तर किसी के पास नहीं है ।
बहुत सारे विवाद ,ग़लतफ़हमियाँ ,झगड़े इसी वजह से होते आये हैं ।
 इन परिस्थितियों में हम हमारी संस्कृति ,साहित्य ,भाषा ,और उनसे बंधी हुई नैतिकता को सम्भाल सकते हैं ?
जैसे जैसे वैश्वीकरण ,उदारीकरण से हमार बाजार विदेशों के खोलते गये ,वैसे वैसे हमारे देश में स्थापित साहित्य जो हमारी नैतिकता का प्रमुख स्तम्भ रहा है उससे जनमानस के समय ,ऊर्जा ,मानसिकता पर प्रभाव पड़ा है ।
न आज पुस्तकों को पढ़ने का समय बचा है ।
न कोई अपने बौद्धिक स्तर को उस ऊँचाई तक ले जाने को इच्छुक हैं  जो हमारे महापुरुषों ने स्थापित किया है ।
उन महापुरुषों के प्रति वह सम्मान भी नहीं बचा है जिसके वे अधिकारी रहे हैं ।
एक समय था जब साहित्यकार अपनी भाषा ,शैली ,संस्कृति को गर्वान्वित होकर प्रस्तुत करता था ,लिखता था ,बोलता था और देशवासी मंत्रमुग्ध होकर उसको सुनते थे ,उससे शिक्षा प्राप्त करते थे ,उसका अनुसरण करते थे ।समय बदलता गया ,बाज़ार अपने ग्लैमर ,चकाचौंध से जनमानस को प्रभावित करता गया ,शिक्षा अब ज्ञान के लिये नहीं कैरियर को सुरक्षित बनाने का माध्यम बन गई ।
युवा अपना भविष्य चिकित्सा ,शिक्षा ,प्रशासनिक ,IT सेक्टर ,विदेशों में विस्थापन पर केंद्रित करने लगे ।
निश्चित रूप से वहाँ तक पहुँचने का मार्ग महंगी शिक्षा ,आधुनिक व्यवस्था और मात्र अंग्रेज़ी माध्यम  से होकर गुजरता है 
क्या ऐसे वातावरण में कोई हमारी प्राचीन परम्पराओं ,भाषाओं ,संस्कृति ,साहित्य के बारे में विचार करने को प्रेरित करता है ?
महँगी शिक्षा प्रदान करने के उपरांत अभिभावक अपनी सन्तान को मात्र आर्थिक रूप से सुदृढ़ होते देखना चाहता है ।
साहित्य ,हिंदी या प्रादेशिक भाषा विद्यार्थी ,अभिभावक के मनोमस्तिष्क से लगभग औझल हो चुके हैं ।
हिंदी भाषा या अन्य प्रादेशिक भाषाओं को बोलने ,लिखने ,प्रोत्साहित करने का न कोई माध्यम बचा है न वातावरण ।
हिंदी साहित्यकार को दोयम दर्जे का सम्मान मिलता है ,हिंदी फिल्मों के गीतकार ,लेखक ,नेता अभिनेता समारोह , सेमिनार में अंग्रेज़ी बोलना पसन्द करते हैं ।
अब हिंदी साहित्य का भविष्य क्या होगा ?
विषय चिंतनीय है ।
संसार में वही संघर्ष कर अपना स्थान सुरक्षित रख पाया है जो समयानुसार स्वयं में  परिवर्तन करने में सक्षम रहा है ।
यदि आज हमें हिंदी साहित्य को जीवित रखना है तो अंग्रेजी साहित्य या टेक्नोलॉजी की आलोचना के बजाय उसी माध्यम को अपना कर स्वयँ को जीवित रखना होगा ।
निश्चित रूप से फेसबुक ,ट्वीटर ,वाट्सअप ,इंस्टाग्राम पर युवा वर्ग अपना क़ीमती समय बर्बाद कर रहा है ।अभिभावक इस नव पीढ़ी को रोकने का अधिकार खो चुके हैं क्योंकि उनका स्वयं का अधिकांश समय इन्हीं उपकरणों पर व्यतीत होता है ।
तो क्या हम हिगेल की भविष्यवाणी को सत्य मान लें क्योंकि पुस्तकें ,पत्रिकाओं के पाठक कोई नहीं है ।
नहीं । मैं इतना निराशावादी नहीं हूँ ।
वर्तमान से कदम मिला कर चलना होगा ,संघर्ष में जीतता वही है जो समयानुसार हथियार उठाना जानता हो ,हथियार का प्रयोग करना जानता हो ।
यह संघर्ष एक व्यक्ति या साहित्यकार नहीं कर सकता ,इसके लिये राष्ट्रीय स्तर पर सुदृढ़ नीति बनाना आवश्यक होगी जिसका पालन करना हर एक के लिए अनिवार्य होगी ।
सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार अनन्त गोपाल शेवड़े का कथन था  --
साहित्य महान है ,चिर स्थायी है , मङ्गलमय है ।साहित्य में कई शीतलता ,कोमलता ,प्रेम ,त्याग की भावना विकसित करता है ।
साहित्य की आधारभूत मूल्य की क्षति नहीं होना चाहिए जबकि राजनीति क्षण भंगुर है ,चंचल है ,अस्थायी है ,परिवर्तनीय है ।
निश्चित रूप से राजनीति देश के विकास ,नीतियों को तय करती है परन्तु साहित्य में वह शक्ति है कि वह चाहे तो देश की राजनीति को तय कर दे ।
इसके लिये आवश्यक है कि देश के स्थापित साहित्यकारों को आगे आना होगा को देश में शासन ,प्रशासन ,मीडिया को दर्पण दिखा सकें ।आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित हो सकें ।
स्वार्थ ,पद ,उपाधियों ,तमगे आर्थिक प्रलोभनों की उपेक्षा कर सके ।
 हिंदी व प्रादेशिक भाषाओं  व वर्तमान स्थिति के बीच सामंजस्य स्थापित कर सकें ।
राजनीति व कुशल शासक  ने सदैव अपने साहित्यकारों  को रत्न समझा है ,उन्हें सम्मान दिया है ,उनकी सलाहें स्वीकार की हैं ।
ऐसे ही शासकों का नाम इतिहास में अमर रहा है ।
यदि शासन ,साहित्य ,मीडिया का संगम हिंदी साहित्य को प्रोत्साहित करने हेतु कटिबध्द हो ,हिंदी साहित्य की उपयोगिता को बढ़ावा देने का प्रण लिया जाता हो ,वातावरण आधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ कदम मिला  कर चलने का बनाया जाता है तो कोई संदेह नहीं कि हिंदी साहित्य संसार की किसी भाषा से टक्कर लेने में सक्षम है परन्तु पहले हमें स्वयँ को दृढ़ निश्चय करना होगा ।
 
लेखक : रिज़वान ऐजाज़ी 
संपादक : हिलव्यू समाचार 
 
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