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Tuesday, June 15, 2021

नए राजवंश का इतिहास ( व्यंग्य) – लेखक : प्रोफ़ेसर गोपेश मोहन जैसवाल

 

अंगने लाल (मुख्यमंत्री) – प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी ! एक इतिहासकार की हैसियत से तुमने पूरे भारत में नाम रौशन किया है, खास कर के नए-नए राजवंशों का इतिहास लिख कर.
अब तुमको हमारे राजवंश का भी इतिहास लिखना है.
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी –हुज़ूर, आपके राजवंश ने हमारे प्रदेश की स्वर्ण-युग में फिर से वापसी कराई है. इस सुनहरे दौर की दास्तान लिखने का फ़ख्र अगर मुझे हासिल हो जाए तो मैं इसे अपनी खुशकिस्मती समझूंगा. 
 

  
अंगने लाल – ऐसा फ़ख्र तो हम तुमको हासिल करने देंगे पर एक शर्त है –
तुम्हारे बारे में सुना है कि तुम राजवंशों का इतिहास लिखते समय झूठ का बहुत सहारा लेते हो लेकिन हमारे राजवंश का इतिहास लिखते समय तुम कुछ भी सरासर झूठ नहीं लिखोगेे.
हाँ, बढ़ा-चढ़ा कर लिखे जाने पर या अर्ध-सत्य लिखे जाने पर हमको कोई ऐतराज़ नहीं होगा. 
 
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी – अन्नदाता ! आपके खानदान के सारे कच्चे-चिट्ठे मैं आप से ही जानना चाहूँगा.
इस कच्चे-चिट्ठे को मैं इतिहास के पन्नों में अर्ध-सत्य का मुलम्मा चढ़ा कर ऐसे पेश करूंगा कि आपका राजवंश, मौर्य राजवंश, गुप्त राजवंश, और मुगलिया खानदान को भी, महानता की दौड़ में पछाड़ देगा.
हाँ तो माई-बाप पहले आप अपने पुरखों के बारे में बताएं.
 
अंगने लाल – हमारे पुरखे तो ज़रायम-पेशा (आपराधिक गतिविधियाँ कर अपना जीवन-यापन करने वाले) लोग थे.
सुनसान सड़कों पर काफ़िले लूटने में उन्हें महारत हासिल थी.
अंग्रेज़ी राज में तो ज़रायम-पेशा क़बीलों में हमारा कबीला टॉप टेन में हुआ करता था.
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी – अगर अंग्रेज़ आपके क़बीले को अपराधी मानते थे तो फिर उसे अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ क्रांति का बिगुल बजाने वाला राज-परिवार कहने से भला मुझे कौन रोक सकता है?
अंगने लाल – क्रांतिकारी राज-परिवार ! वाह क्या दूर की कौड़ी लाए हो प्रोफ़ेसर !
लेकिन हमारे दादा जी का क्या करोगे?
वो तो बटमारी का अपना खानदानी पेशा छोड़ कर कलक्ट्रेट में चपरासी हो गए थे.
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी –दयानिधान ! मैं तो 'खानसामा' को बिना तक़ल्लुफ़ - 'खानेखाना' बनाने वालों में से हूँ.
आपके दादाजी कलक्ट्रेट में मुलाज़िम थे तो मैं यह लिख दूंगा कि वो कलक्टर थे.
इसमें कलक्ट्रेट में काम करने वाली बात तो झूठी नहीं होगी.
अब आप अपने माता-पिता के बारे में बताएं.
अंगने लाल –अपनी माता जी के खानदान के बारे में तो हमको कुछ ख़ास पता नहीं.
हाँ, इतना पता है कि वो हमारे पिताजी के साथ भागने से पहले तीन-चार अन्य प्रेमियों के साथ भी भागी थीं.
 
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी –तो फिर आपकी माता जी को मैं ख्यातिप्राप्त धाविका लिख देता हूँ.
और आपके पूज्य पिताजी क्या करते थे?
अंगने लाल –हमारे दादा जी तो पिता जी को पंखा कुली की नौकरी दिलवाना चाहते थे लेकिन उनका मन तो सिर्फ़ मन्दिर की चौखट पर रखे हुए जूते-चप्पल चुराने में ही रमता था.
अब बताओ हिस्टोरियन बाबू ! इस सत्य पर तुम अर्ध-सत्य का मुलम्मा कैसे चढ़ाओगे?
 
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी – मालिक ! मैं आपके पिताजी के पेशे के बारे में कुछ नहीं लिखूंगा.
हाँ, इतना ज़रूर लिखूंगा कि वो बिना मन्दिर जाए कभी अन्न-जल ग्रहण नहीं करते थे.
 
अंगने लाल - हमारे बारे में क्या लिखोगे? हम तो राजनीति में आने से पहले लाठी लेकर गाय-भैंस हांका करते थे.
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी – भगवान शंकर को पशुपति कहा जाता है.
कान्हा जी गाय चराते थे और ईसा मसीह, हज़रत मुहम्मद भेड़ें चराते थे.
मैं आपको इन सबका हम-पेशा बता कर आपको भी मसीहाई दर्जा दिला कर रहूँगा.
अंगने लाल – इतिहासकार बाबू ! हम लगभग अंगूठा-छाप हैं, इस सत्य को कैसे ढकोगे?
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी – मैं आपको कबीरपंथी कहूँगा.
वैसे गुरुदेव कहे जाने वाले रबीन्द्रनाथ टैगोर के पास भी कोई डिग्री नहीं थी.
अंगने लाल – अपने नालायक लड़के का हम क्या करेंं? उस कमबख्त को तो राजनीति से ज़्यादा दिलचस्पी स्मगलिंग में है.
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी – राजन ! मैं आपके राजकुंवर को आयात-निर्यात व्यापार के उभरते हुए सितारे के रूप में प्रस्तुत करूंगा.
वैसे भी राजनीति में उतरने से पहले इस प्रकार के साहसिक अभियानों का अनुभव तो उनके लिए लाभदायक होगा ही.
अंगने लाल – ठीक है लिखो हमारे राजवंश का इतिहास !
पर ये बताओ प्रोफ़ेसर, तुम पिछले दिनों किस राजवंश का इतिहास लिख रहे थे?
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी – हुज़ूर, वैसे ये बात टॉप सीक्रेट है पर मैं आपको बता देता हूँ.
पिछले दिनों मैं दाऊद इब्राहीम राजवंश का इतिहास लिख रहा था. 
 
 
लेखक : प्रोफ़ेसर गोपेश मोहन जैसवाल
 
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2 comments:

  1. अरे वाह! आदरणीय गोपेश सर को ढेरों बधाई।
    यह साहित्य का सौभाग्य है जो आज भी अपने कर्तव्यों को समझने वाली उसका अनुसरण करने वाली लेखनीयाँ निर्भीक होकर अपना कर्म कर रही हैं। अभिव्यक्ति की तालाबंदी भी एसी लेखनी को अपनी बात कहने से रोक नही सकती। आदरणीय गोपेश सर की लेखनी की धार भी कुछ इसी प्रकार है कि इसके वार से संजीवनी बूटी भी नही बचा सकती। एसी कर्तव्यनिष्ठ लेखनी रणभूमि में बरछी के समान होती हैं। कुछ पंक्तियों के साथ मेरा कोटिशः प्रणाम सर की लेखनी को 🙏

    धीश ने है ताक पर कर्तव्य जबसे रख दिया,
    लेखनी ने तबसे ही
    बरछी में खुद को बदल लिया,
    बदल दिए हैं नाम सारे
    प्रतीक का संबल लिया,
    मुहँ पर लगे थे ढेरों ताले
    फिर भी वार उसपर ही किया।

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  2. मेरी व्यंग्य-रचना को 'नज़रिया नाउ' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में सम्मिलित करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद !

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